हिंदू संगठन ने ईसाई स्कूलों को धार्मिक प्रतीक छोड़ने या ‘गंभीर परिणाम भुगतने’ की धमकी दी !


हिंदुत्ववादी संगठन ‘कुटुंब सुरक्षा परिषद’ द्वारा जारी अल्टीमेटम में यीशु और मैरी की प्रतिमाओं और तस्वीरों के साथ-साथ स्कूल परिसरों में स्थित चर्चों को भी हटाना शामिल है. संगठन ने दावा किया है कि इस क़दम का उद्देश्य ‘ईसाई मिशनरियों को धर्मांतरण गतिविधियों के लिए स्कूलों का उपयोग करने से रोकना’ है.

नई दिल्ली: असम में एक हिंदू संगठन ने राज्य के ईसाई स्कूलों को अपने परिसरों में पादरियों, ननों और सहोदरों द्वारा पहने जाने वाले सभी ईसाई प्रतीकों और धार्मिक पहनावों को रोकने के लिए 15 दिन का अल्टीमेटम दिया है.यूसीए न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, कुटुंब सुरक्षा परिषद द्वारा जारी अल्टीमेटम में यीशु और मैरी की प्रतिमाओं और तस्वीरों के साथ-साथ स्कूल परिसरों में स्थित चर्चों को भी हटाना शामिल है.

संगठन ने दावा किया है कि इस कदम का उद्देश्य ‘ईसाई मिशनरियों को धर्मांतरण गतिविधियों के लिए स्कूलों का उपयोग करने से रोकना’ है.7 फरवरी को गुवाहाटी में एक संवाददाता सम्मेलन में संगठन के अध्यक्ष सत्य रंजन बोरा ने कहा, ‘ईसाई मिशनरी स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों को धार्मिक संस्थानों में परिवर्तित कर रहे हैं. हम इसकी अनुमति नहीं देंगे.’

संगठन ने चेतावनी दी है कि अगर ईसाई स्कूल मांग पूरी नहीं करते हैं तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने होंगे.

गुवाहाटी के आर्कबिशप जॉन मूलचिरा ने आरोपों को निराधार बताया. उन्होंने यूसीए न्यूज को बताया, ‘हम खतरे से अवगत हैं और मुझे समझ नहीं आ रहा है कि ऐसा क्यों हो रहा है.’ उन्होंने साथ ही कहा कि ऐसे खुले खतरों से निपटने के लिए कानून उपायों पर विचार किया जाएगा.अल्टीमेटम के जवाब में ईसाई नेताओं ने एहतियात के तौर पर पादरियों, ननों और सहोदरों को परिसरों में आम भारतीय पोशाक पहनने की सलाह दी है.ईसाई नेताओं ने ईसाई धर्म और मिशनरी गतिविधियों पर उत्पन्न खतरों से निपटने के लिए असम के मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के सदस्य हिमंता बिस्वा शर्मा से संपर्क करने की योजना बनाई है.

ईसाई नेताओं का कहना है कि हिंदू संगठनों द्वारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने के बाद से हाल के वर्षों में पूरे पूर्वोत्तर भारत क्षेत्र में ईसाई धर्म और मिशनरी गतिविधियों के लिए खतरे बढ़ गए हैं.यूसीए की रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंदू संगठन ईसाई धर्म को हिंदू मूल संस्कृति को नष्ट करने और हिंदुओं को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने वाली एक शैतानी ताकत के रूप में चित्रित करने में सफल रहे हैं.

असम में ईसाइयों की आबादी 3.74 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत 2.3 प्रतिशत से अधिक है.

ईसाइयों के मुद्दे पर काम करने वाले सिविल सोसायटी संगठन यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम (यूसीएफ) ने पिछले साल एक बयान जारी कर समुदाय के खिलाफ हमलों में वृद्धि पर प्रकाश डाला था. इसने बताया था कि 2023 के पहले आठ महीनों में ही भारत में ईसाइयों के खिलाफ 525 हमले हुए थे.संगठन ने चेतावनी दी थी कि अगर यह प्रवृत्ति जारी रही तो 2023 भारत में ईसाई समुदाय के लिए अब तक देखे गए सबसे हिंसक और कठिन वर्षों में से एक साबित होगा, जो 2022 और उससे पहले 2021 के हालिया रिकॉर्ड को तोड़ देगा.संगठन ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा था, ‘हिंसा की ये सभी घटनाएं एक विशेष आस्था के तथाकथित निगरानी समूहों के नेतृत्व में भीड़ द्वारा की गई हिंसा है, जिन्हें कथित तौर पर सत्ता में बैठे लोगों से समर्थन मिल रहा है.’

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